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रिपोर्ट : कर्मियों और भौतिक संसाधनों की कमी भी है मुकदमों के बोझ का कारण

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अदालतों पर मुकदमों का बोझ

जजों की स्थिति

सुप्रीम कोर्ट: कोई पद खाली नहीं, कुल जज 34।
हाईकोर्ट: कुल स्वीकृत क्षमता 1122, लेकिन 793 जज कार्यरत; 329 पद खाली।
जिला अदालतें: स्वीकृत पद लगभग 25,000, लेकिन करीब 5,500 पद खाली।
अदालत सहायक कर्मचारी: 21% पद खाली।

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लंबित मुकदमों का आंकड़ा

सुप्रीम कोर्ट: 86,728 मामले लंबित।
हाईकोर्ट: 63,37,265 मामले लंबित।
जिला अदालतें: 4 करोड़ 68 लाख 27 हजार मामले लंबित।

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नई दिल्ली। देश की अदालतों में बढ़ते मुकदमों के बोझ के लिए अक्सर जजों की कमी को जिम्मेदार ठहराया जाता है, लेकिन इसकी कई और वजहें भी हैं। केंद्रीय विधि एवं न्याय मंत्रालय ने स्वीकार किया है कि अदालत सहायक कर्मियों, भौतिक संसाधनों की कमी, जांच एजेंसियों, वकीलों और अन्य हितधारकों के बीच तालमेल का अभाव भी प्रमुख कारण हैं। इसके अलावा, मुकदमों को निपटाने के लिए समय-सीमा तय न होना भी एक बड़ी वजह है।

लंबित मुकदमों की स्थिति
देशभर की अदालतों में 5 करोड़ से अधिक मुकदमे लंबित हैं। इस मुद्दे पर केंद्रीय विधि एवं न्याय मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने राज्यसभा में अपने लिखित जवाब में कहा कि मुकदमों के लंबित रहने के पीछे कई कारण हैं। इनमें अदालतों की अवसंरचना की कमी और अदालत सहायक कर्मचारियों की उपलब्धता की समस्या भी शामिल है।

अदालत कर्मियों की कमी
देश की अदालतों में लगभग 21 फीसदी अदालत सहायक कर्मियों के पद खाली हैं। मंत्रालय ने बताया कि मुकदमों के लंबित रहने के अन्य कारणों में मामलों की जटिलता, साक्ष्यों की प्रकृति, बार (वकीलों के संघ), जांच एजेंसियों, गवाहों और वादियों के सहयोग का अभाव तथा नियमों और प्रक्रियाओं के उचित अनुप्रयोग की कमी शामिल है।

अन्य बड़ी वजहें
कानून मंत्रालय के अनुसार, देरी की अन्य वजहों में समय-सीमा का अभाव, बार-बार स्थगन, समान प्रकृति के मामलों के लिए निगरानी और समूहबद्ध करने की व्यवस्था की कमी शामिल हैं। आपराधिक मामलों में पुलिस, अभियोजन, फॉरेंसिक लैब, हस्तलेखन विशेषज्ञों और चिकित्सा-कानूनी विशेषज्ञों जैसी एजेंसियों से अपेक्षित सहयोग न मिलने के कारण भी मुकदमों का निपटारा देर से होता है।

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