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एकनाथ शिंदे की कार्यशैली : अंतिम पंक्ति के व्यक्ति तक पहुंचने का प्रयास

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सरल जीवन उच्च विचार में भी एक कदम आगे शिंदे

लेखिका : शायना एन.सी.
राष्ट्रीय सचिव एवं प्रवक्ता, शिवसेना

राजनीति में अक्सर देखा जाता है कि नेता चुनाव के समय जनता के बीच दिखाई देते हैं, लेकिन चुनाव समाप्त होते ही आम लोगों से उनकी दूरी बढ़ जाती है। हालांकि कुछ नेता ऐसे भी होते हैं जिनके लिए जनसेवा चुनावी गतिविधि नहीं, बल्कि जीवन का उद्देश्य होती है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी वरिष्ठ भाजपा नेता अशोक भट्ट का उल्लेख करते हुए बताया था कि मंत्री रहते हुए भी वे आधी रात को लोगों की सहायता के लिए तत्पर रहते थे। गुजरात के भूकंप के बाद मोदी की सक्रियता और पूर्व राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम की सहज उपलब्धता भी जनसेवा के ऐसे ही उदाहरण हैं।

महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे की कार्यशैली में भी यही दृष्टिकोण दिखाई देता है। उनकी राजनीति का केंद्र आम जनता से जुड़ाव और उसकी समस्याओं को सुनना रहा है। हालिया विजयादशमी संबोधन में उन्होंने शिवसैनिकों से शहरी आयोजन के बजाय सूखा प्रभावित किसानों के बीच पहुंचने का आह्वान किया। किसानों को आर्थिक सहायता, राशन किट और अन्य राहत उपलब्ध कराने के साथ प्रभावित खेतों का पंचनामा भी कराया जा रहा है।

आम लोगों के लिए सहज उपलब्धता

सार्वजनिक जीवन में आने से पहले भी शिंदे की संवेदनशीलता के उदाहरण सामने आए हैं। वर्ष 1989 के मुंबई दंगों के दौरान उन्होंने रात में एक महिला और उसके बच्चे को रिक्शे से अस्पताल पहुंचाया था। इसी तरह एक बार मुंबई में सड़क किनारे खड़ी एंबुलेंस में अस्पताल का बिस्तर न मिलने के कारण घर लौट रहे मरीज की स्थिति देखकर उन्होंने हस्तक्षेप किया और ठाणे के अस्पताल में उसके उपचार की व्यवस्था कराई।

शिंदे का कहना है कि वे कतार में खड़े अंतिम व्यक्ति की बात भी सुनना चाहते हैं। मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने वर्षा बंगले के दरवाजे आम जनता के लिए चौबीसों घंटे खुले रखने की बात कही थी। दूरदराज से आने वाले लोगों की शिकायतें सुनने और उनके समाधान के लिए वे अधिकारियों के साथ काम करते रहे।

यह कार्यशैली शिवसेना प्रमुख बालासाहेब ठाकरे की उस परंपरा की भी याद दिलाती है, जिसमें वे समाचार पत्रों में प्रकाशित नागरिक समस्याओं पर संबंधित अधिकारियों से सीधे बात करते थे।

संगठन और प्रशासन में जवाबदेही

शिंदे ने शिवसेना के मंत्रियों को पार्टी मुख्यालय में जनता दरबार आयोजित करने के निर्देश दिए थे, ताकि आम नागरिकों की शिकायतों का समाधान हो सके। मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने जिलाधिकारियों को सरकारी अस्पतालों, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और चिकित्सा महाविद्यालयों का निरीक्षण कर स्थिति रिपोर्ट प्रस्तुत करने को भी कहा था।

उनकी कार्यशैली में जनसंपर्क के साथ प्रशासनिक जवाबदेही पर भी जोर दिखाई देता है। इस वर्ष शिवसेना ने विजयादशमी समारोह को सूखा प्रभावित किसानों की समस्याओं से जोड़कर उनके प्रति एकजुटता का संदेश दिया।

नेतृत्व का वास्तविक अर्थ केवल पद और अधिकार तक सीमित नहीं होता। जनता के बीच बने रहना, उसकी कठिनाइयों को समझना और यथासंभव समाधान के लिए प्रयास करना भी उसकी महत्वपूर्ण कसौटी है।

नई पीढ़ी को ऐसे सार्वजनिक जीवन से यह सीख लेनी चाहिए कि सच्चा नेतृत्व वही है जो आम आदमी की आवाज सुने और उसकी आवश्यकताओं को प्राथमिकता दे।

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