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यादें 1947 की- दिल्ली में जलती इंसानियत की मशालें . 1947 की- कौन दे रहा था शरणार्थियों को सहारा

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दिल्ली अगस्त, 1947 में जल रही थी। दंगे हो रहे थे और शरणार्थी आ रहे थे। तब कई अनाम स्वंयसेवी संगठनों और डॉक्टरों ने दिल्ली में दंगों में घायल लोगों और सरहद के उस पार से आ रहे शारणार्थियों की दिन-रात सेवा की थी। ये ब्लॉग उन्हीं फरिश्तों पर।

विवेक शुक्ला वरिष्ठ पत्रकार

समीक्षक और विश्लेषक

मनोज कुमार जब भी दिल्ली आते, एक अजीब-सी बेचैनी उनके अंदर उठती। सिविल लाइंस के उन दो स्थानों से गुजरना उनके लिए सिर्फ रास्ता तय करना नहीं होता था—यह एक चुपचाप अदा की जाने वाली नज़र थी। दिल्ली ब्रदरहुड हाउस और सेंट स्टीफंस अस्पताल। दोनों जगहें उनके जीवन की उस अंधेरी रात की याद दिलाती थीं, जब सब कुछ छूट गया था और कुछ भी बाकी नहीं बचा था।

अगस्त 1947। देश दो टुकड़ों में बँट चुका था। सरहद के उस पार से आते हुए मनोज कुमार का परिवार दिल्ली पहुँचा। छोटा भाई बीमार था। उसका इलाज सेंट स्टीफंस अस्पताल में हुआ। और सैकड़ों अन्य शरणार्थियों की तरह पूरा परिवार दिल्ली ब्रदरहुड हाउस के परिसर में ठहरा। इन दोनों स्थानों के प्रति कृतज्ञता का भाव उनके मन में जीवन भर बना रहा।शरणार्थियों का सैलाबउस समय दिल्ली की हालत भयावह थी।

एक ओर सांप्रदायिक दंगों की लपटें उठ रही थीं, दूसरी ओर हिंदू-सिख शरणार्थियों का सैलाब शहर में घुस रहा था। लगभग नौ लाख की आबादी वाले इस शहर से करीब तीन लाख मुसलमान पाकिस्तान चले गए और लगभग पाँच लाख हिंदू-सिख शरणार्थी यहाँ आकर बसने लगे। पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन पर रेलगाड़ियाँ खून से सनी, घायल और आतंकित यात्रियों से भरी उतर रही थीं।

हर तरफ चीखें, चीख-पुकार और असमंजस। किनकी देखरेख में इलाजसरकारी मशीनरी के अलावा कई स्वयंसेवी संगठन मैदान में उतरे। इनमें दिल्ली ब्रदरहुड सोसायटी (डीबीएस) भी शामिल थी। इसकी जड़ें 1877 में कैंब्रिज मिशन के साथ राजधानी में जमी थीं। इसी मिशन ने 1881 में सेंट स्टीफंस कॉलेज और 1885 में सेंट स्टीफंस अस्पताल की नींव रखी। विभाजन की हिंसा के दौरान इनके स्वयंसेवक पुरानी दिल्ली स्टेशन पर पहुँच रहे घायलों और शरणार्थियों को अस्पताल ले जाते।

कई घायलों का इलाज डॉ. रूथ रोज़वियर जैसी चिकित्सकों की देखरेख में हुआ।सिविल लाइंस स्थित ब्रदरहुड हाउस परिसर में फादर वेदरवेल के नेतृत्व में अस्थायी आश्रय दिया गया। जाति-धर्म से ऊपर उठकर पानी, दवा, छाया और सुरक्षा मुहैया कराई गई। स्वयंसेवक रात-दिन बिना थके काम करते रहे।अकेले डीबीएस सक्रिय नहीं था।

सनातन धर्म और आर्य समाज के कार्यकर्ता सरहद पार से आ रहे शरणार्थियों की सुरक्षा, राहत शिविर और खाद्य वितरण में लगे थे। जत्थेदार संतोख सिंह के नेतृत्व में सिख गुरुद्वारा प्रबंधक समितियों और अन्य सिख संगठनों ने भोजन, चिकित्सा सहायता और सुरक्षा का काम संभाला। आगे चलकर इन्हीं प्रयासों से दिल्ली में माता सुंदरी कॉलेज और हरकिशन पब्लिक स्कूल की स्थापना हुई।

किसने मारा उस फरिश्ते कोरेड क्रॉस दवाइयाँ और स्वास्थ्य सेवाएँ दे रहा था। लेडी माउंटबेटन के नेतृत्व में यूनाइटेड काउंसिल फॉर रिलीफ एंड वेलफेयर ने कई गैर-सरकारी संगठनों को समन्वित किया। कांग्रेस की राहत समितियाँ, कस्तूरबा कार्यकर्ता, अखिल भारतीय महिला सम्मेलन की दिल्ली शाखा और अन्य महिला समूह भोजन, वस्त्र और बच्चों की देखभाल में जुटे थे।

डॉ. एन.सी. जोशी करोल बाग समेत कई इलाकों में घायलों की सेवा कर रहे थे।उन्हें भी दंगों में मार दिया गया। आज करोल बाग के जोशी रोड पर उनके नाम का अस्पताल चल रहा है। गांधी जी की चिकित्सक भी सक्रियइरविन अस्पताल (अब लोक नायक अस्पताल) और लेडी हार्डिंग अस्पताल में भी घायलों का इलाज हो रहा था। लेडी हार्डिंग कॉलेज की प्रिंसिपल डॉ. के.जे. मैक्डरमेट और उनकी सहयोगी डॉ. ओ.पी. बाली रोज अठारह-अठारह घंटे मरीजों के साथ रहती थीं। गांधी जी की निजी चिकित्सक डॉ. सुशीला नैयर भी शरणार्थियों और घायलों के साथ थीं। वे गांधी जी के साथ दंगा-प्रभावित इलाकों में जाकर शांति की अपील करतीं। आगे चलकर वे दिल्ली की पहली स्वास्थ्य मंत्री बनीं।डीबीएस के प्रभारी ब्रदर सोलोमन जॉर्ज बताते हैं कि मनोज कुमार जीवन के अंत तक संस्था का आदर करते रहे। हजारों जिंदगियों को राहतइन स्वयंसेवी प्रयासों ने हजारों जिंदगियों को राहत दी। स्टेशन से अस्पताल तक पहुँचाना, घायलों का इलाज, शिविरों में भोजन-पानी और कुछ हद तक हिंसा पर अंकुश किया। ये सब इन्हीं लोगों की मेहनत से संभव हुआ। सेंट स्टीफंस अस्पताल और कॉलेज उस समय मानवीय सहायता के जीवित केंद्र बन गए थे।विभाजन ने दिल्ली को गहरे घाव दिए। लाखों लोग विस्थापित हुए, हजारों मारे गए। लेकिन उसी अंधेरे में स्वयंसेवकों की रोशनी भी चमकती रही। बिना किसी राजनीतिक स्वार्थ के, धर्म और जाति की दीवारों को पार कर जो लोग घायलों को उठाए जा रहे थे, वे मानवीयता के सच्चे प्रतिनिधि थे। आज भी कुछ बुजुर्ग मिल जाएँगे जिन्होंने उस कठिन दौर में फरिश्तों को दिन-रात लूटे-पिटे लोगों की सेवा करते देखा था।ब्रदरहुड हाउस और सेंट स्टीफंस अस्पताल आज भी उस युग की याद दिलाते हैं, जब इंसानियत ने बाकी सब कुछ भुलाकर सिर्फ इंसान की मदद की थी।

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