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हिंदुत्व की उदार दृष्टि और मुस्लिम समाज : न्यूयॉर्क से निकला संदेश

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✍🏻पार्थसारथि थपलियाल विश्लेषक और समीक्षक

न्यूयॉर्क का मैडिसन स्क्वायर गार्डन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष के अंतर्गत संघ प्रमुख मोहन भागवत द्वारा जो वैश्विक प्रबोधन किया गया लगता है वह 11 सितंबर, 1893 को शिकागो विश्वधर्म सम्मेलन स्वामी विवेकानंद के उद्बोधन का पुनर्स्मरण है।

उन्होंने हिंदुत्व को किसी संकीर्ण धार्मिक पहचान के रूप में नहीं, बल्कि मानवता की एकता और विविधता के सह-अस्तित्व की दृष्टि से प्रस्तुत किया। संघ प्रमुख मोहन भागवत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यदि कोई हिंदू यह मानता है कि भारत में मुसलमान नहीं होने चाहिए, तो वह हिंदू नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि अलग-अलग धर्मों के मार्ग भिन्न हो सकते हैं, लेकिन मानवता और सत्य एक हैं तथा प्रत्येक मनुष्य की गरिमा समान है। इसके पीछे हिंदू चिंतन की उस दीर्घ परंपरा को समझना आवश्यक है जिसमें सत्य को किसी एक पंथ या संप्रदाय की संपत्ति नहीं माना गया।

एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति का वैदिक भाव हो अथवा वसुधैव कुटुम्बकम्” की उपनिषद्-परंपरा भारतीय दृष्टि में विविधता को मिटाकर एकरूपता स्थापित करना लक्ष्य नहीं रहा, बल्कि विविधताओं के बीच अंतर्निहित एकता को स्वीकार करना लक्ष्य रहा है। यहीं से हिंदुत्व की उस व्याख्या पर विचार करने का अवसर मिलता है जिसे भागवत वैश्विक मंच पर सामने रख रहे हैं। उनके अनुसार हिंदुत्व किसी एक पूजा-पद्धति का नाम मात्र नहीं है। वह भारत की उस सांस्कृतिक चेतना का नाम है जो अनेक मतों, पंथों, भाषाओं और जीवन-पद्धतियों को साथ लेकर चलने की क्षमता रखती है। विदेश में हिंदुत्व को समावेशी, उदार और मानवतावादी स्वर में प्रस्तुत करना निश्चित रूप से सकारात्मक है।

किंतु भारत में हिंदू-मुस्लिम संबंधों को लेकर समय-समय पर उत्पन्न होने वाला तनाव, राजनीतिक ध्रुवीकरण और एक-दूसरे के प्रति अविश्वास इस उदार संदेश की परीक्षा लेते हैं। इसलिए प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि मोहन भागवत ने न्यूयॉर्क में क्या कहा। बड़ा प्रश्न यह है कि क्या भारतीय समाज में भी इसी विचार को व्यवहार का आधार बनाया जा सकता है? न्यूयॉर्क में कही गई बात का महत्व तभी बढ़ेगा जब उसका प्रभाव भारत के सामाजिक जीवन में भी दिखाई दे। यही इस वक्तव्य के सामने सबसे बड़ी कसौटी है। यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना होगा। मुस्लिम समाज के प्रति उदार दृष्टिकोण का अर्थ हिंदू समाज से अपनी सांस्कृतिक पहचान छोड़ देने की अपेक्षा नहीं हो सकता। उसी प्रकार हिंदुत्व का आत्मविश्वास दूसरे धर्मों के प्रति घृणा पर आधारित नहीं हो सकता।

हिंदू समाज अपनी परंपराओं, मंदिरों, तीर्थों, संस्कारों, भाषाओं, दर्शन और जीवन- मूल्यों के प्रति गौरव रख सकता है और साथ ही मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन तथा अन्य समुदायों के समान सम्मान का पक्षधर हो सकता है। इसीलिए भारत में “सर्वधर्म समभाव”, “एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति” और “वसुधैव कुटुम्बकम्” जैसे सूत्र केवल धार्मिक नारे नहीं हैं। वे सामाजिक दर्शन के आधार बन सकते हैं। भारत में जन्म लेने वाला प्रत्येक नागरिक राष्ट्र की सामूहिक यात्रा का सहभागी है। किसी मुसलमान की देशभक्ति का प्रमाण केवल इसलिए अधिक नहीं हो सकता कि वह अपने धर्म से अलग किसी सांस्कृतिक प्रतीक को स्वीकार करता है; और किसी हिंदू की राष्ट्रभक्ति भी केवल धार्मिक पहचान के कारण स्वतः सिद्ध नहीं हो जाती। राष्ट्र का आधार नागरिकता, कर्तव्य, संविधान, सांस्कृतिक स्मृति और साझा राष्ट्रीय जीवन होना चाहिए। संघ प्रमुख मोहन भागवत का न्यूयॉर्क संदेश जितना व्यापक है, उतनी ही बड़ी जिम्मेदारी वह संघ पर भी डालता है।

यदि हिंदुत्व वास्तव में समावेशी है तो इस समावेशिता को सामाजिक व्यवहार में दिखाई देना चाहिए। यदि हिंदू यह मानने के लिए प्रेरित किया जा रहा है कि भारत में मुसलमानों के लिए कोई स्थान न चाहना हिंदुत्व नहीं है, तो फिर मुस्लिम समाज के प्रति अपमानजनक भाषा, सामुदायिक घृणा और सामाजिक बहिष्कार को भी उसी स्पष्टता से अस्वीकार किया जाना चाहिए।

इसी प्रकार मुस्लिम समाज से भी अपेक्षा होनी चाहिए कि वह भारत की सभ्यतागत चेतना, राष्ट्रीय प्रतीकों और संविधान के प्रति समान निष्ठा को अपनी सार्वजनिक पहचान का हिस्सा बनाए। समाज में न्यूयॉर्क संदेश के बाद अनेक प्रतिक्रियाएं वायरल हो रही हैं। जैसे क्या संघ अपनी हिंदुत्व की मूल भावना से भटक रहा है? कश्मीरी हिंदुओं के साथ 1990 में जिस तरह बर्बरता हुई, क्या संघ स्वयं को इन घटनाओं से अलग देखता है? क्या इस्लाम शिर्क, काफिर, उम्मत, खिलाफत जैसे शब्दों के प्रति सहिष्णु भाव को बढ़ा पायेगा। क्या ऐसी कल्पना भारत में संभव है।

भारत को न तो ऐसा हिंदुत्व चाहिए जो अपनी सांस्कृतिक पहचान से लज्जित हो और न ऐसा हिंदुत्व जो अपनी पहचान की रक्षा के नाम पर दूसरे भारतीयों के प्रति घृणा पैदा करे। भारत की आवश्यकता उस आत्मविश्वासी हिंदुत्व की है जो अपनी जड़ों में गहरा हो और अपने व्यवहार में उदार। सर्वे भवन्तु सुखिनः की प्रार्थना तभी सार्थक होगी जब सुख की परिधि में अपना ही समुदाय नहीं, पूरा समाज आए। यह व्यापक दृष्टिकोण है। कुछ स्वर तीव्रता लिए हुए भी हैं।

क्या संघ ने अपनी स्थापति नीति को बदल लिया है? मैडिसन स्क्वायर गार्डन से निकला संदेश इसलिए केवल अमेरिका में बसे भारतीयों के लिए नहीं है। इसकी असली परीक्षा गंगा, यमुना, नर्मदा, कावेरी और ब्रह्मपुत्र के किनारे बसे भारत में होगी। यदि हिंदुत्व वास्तव में “विविधता में एकता” को भारत की आत्मा मानता है, तो हिंदू-मुस्लिम संबंधों में विश्वास, संवाद और परस्पर सम्मान उसकी स्वाभाविक परिणति होनी चाहिए।

हिंदुत्व की शक्ति संख्या में नहीं, समावेशी संस्कार में है, और भारत की शक्ति एकरूपता में नहीं, अपनी विविधताओं को एक राष्ट्रीय चेतना में पिरोने की क्षमता में है। यही न्यूयॉर्क के उस वैश्विक मंच से आए संदेश का सबसे महत्वपूर्ण और दूरगामी अर्थ है।

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