
महाराष्ट्र में कोचिंग क्लासेस को विनियमित करने के लिए राज्य सरकार द्वारा प्रस्तावित नए नियमों के मसौदे पर अब शिक्षण जगत में व्यापक बहस शुरू हो गई है।
इसी को लेकर कल मराठी पत्रकार संघ में कोचिंग क्लास ओनर्स एसोसिएशन (एमसीओए) ने अपनी आधिकारिक रूप से अपना पक्ष रखा और संगठन किसी भी प्रकार के नियमों का विरोध नहीं करता, मुंबई में जारी अपने ।एमसीओए ने बताया कि यह विवाद कोई नया नहीं है, बल्कि पिछले दो दशकों से न्यायालयों में विचाराधीन रहा है। संगठन के अनुसार वर्ष 2000 में तत्कालीन सरकार द्वारा जारी अध्यादेश को माननीय उच्च न्यायालय ने “अविवेकपूर्ण एवं अन्यायपूर्ण” मानते हुए निरस्त कर दिया था। इसके बाद वर्ष 2017 में भी एक मसौदा कानून तैयार किया गया, किंतु उसे कभी लागू नहीं किया जा सका।संगठन ने आरोप लगाया कि पूर्व के कई मसौदों में ऐसे प्रावधान शामिल किए गए थे जो संवैधानिक मर्यादाओं के विपरीत थे। इनमें कोचिंग क्लासेस की फीस पर सरकारी नियंत्रण तथा अतिरिक्त आयकर जैसे प्रावधान शामिल थे, जिन्हें राज्य सरकार के अधिकार क्षेत्र से बाहर बताया गया। एमसीओए का कहना है कि ऐसे प्रावधान पुनः न्यायालयों में चुनौती का विषय बन सकते हैं।पेपर लीक जैसी घटनाओं के लिए कोचिंग संस्थानों को दोषी ठहराए जाने पर भी संगठन ने कड़ा विरोध जताया और एमसीओए ने कहा कि प्रश्नपत्र लीक की घटनाएँ प्रायः स्कूलों, कॉलेजों अथवा सरकारी तंत्र से जुड़े भ्रष्ट तत्वों की मिलीभगत से होती हैं। संगठन ने दावा किया कि वर्ष 2004 से अब तक उसने अनेक पेपर लीक मामलों को उजागर करने में सक्रिय भूमिका निभाई है।
संगठन का तर्क है कि यदि प्रश्नपत्र पहले से उपलब्ध हो जाएँ, तो विद्यार्थी कोचिंग क्लासेस में प्रवेश ही क्यों लेंगे ? इसलिए ऐसी घटनाएँ स्वयं कोचिंग उद्योग के हितों के भी विरुद्ध हैं।
एमसीओए ने राज्य सरकार से यह भी मांग की कि सहायता प्राप्त एवं गैर-सहायता प्राप्त विद्यालयों तथा महाविद्यालयों के वे शिक्षक और प्राध्यापक, जो नियमों का उल्लंघन करते हुए निजी ट्यूशन या कोचिंग संस्थानों में समानांतर शिक्षण कार्य करते हैं, उनके विरुद्ध कठोर कार्रवाई की जाए।
संगठन ने वर्ष 2012 से 2017 के बीच चलाए गए तथाकथित “इंटीग्रेटेड कोचिंग मॉडल” का भी उल्लेख किया, जिसमें कॉर्पोरेट कोचिंग संस्थानों और कॉलेजों के बीच गठजोड़ कर विद्यार्थियों को एकीकृत शिक्षण व्यवस्था के नाम पर जोड़ा गया था।

एमसीओए ने बताया कि इस व्यवस्था के विरुद्ध उसने उच्च न्यायालय में याचिका दायर की थी, जिसके परिणामस्वरूप न्यायालय द्वारा कुछ प्रतिबंधात्मक आदेश भी जारी किए गए थे।
हालांकि संगठन का आरोप है कि यह मॉडल आज भी परिवर्तित स्वरूप में जारी है।एमसीओए ने सरकार से मांग की है कि प्रस्तावित नियमों में “इंस्पेक्टर राज” जैसी स्थिति उत्पन्न हो सकती है।
नियम संतुलित, पारदर्शी और व्यावहारिक हों, ताकि स्वतंत्र रूप से संचालित कोचिंग संस्थानों का अस्तित्व प्रभावित न हो।
संगठन ने कहा कि सरकार नये नियम निर्माण में कोचिंग क्लास ओनर्स एसोसिएशन के प्रतिनिधियों को भी उस कमेटी में शामिल करें जो नियम कानून बनाये।
संगठन ने राज्य सरकार से आग्रह किया कि कोचिंग क्लासेस को शिक्षा व्यवस्था के पूरक एवं सहयोगी अंग के रूप में देखा जाना चाहिए। संगठन ने अपना पक्ष रखते हुए कहा यदि सरकार और कोचिंग क्षेत्र के बीच समन्वय स्थापित हो, तो विद्यार्थियों के हित में अधिक प्रभावी और गुणवत्तापूर्ण शैक्षणिक वातावरण तैयार किया जा सकता है।

