

सुनील लोढा प्रभारी
– शिक्षक स्नातक प्रकोष्ठ भाजपा महाराष्ट्र
पर्युषण महापर्व : आत्मोन्नति की सीढ़ियाँ
पर्युषण जैन धर्म का सर्वाधिक पवित्र, आध्यात्मिक एवं महत्त्वपूर्ण पर्व है। यह हजारों वर्षों से चली आ रही जैन श्रमण परंपरा का गौरवशाली उत्सव है। जैन परंपरा के प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव से लेकर चौबीसवें एवं अंतिम तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी तक इस महान आध्यात्मिक परंपरा का निरंतर विकास हुआ है।
‘पर्युषण’ का शाब्दिक अर्थ है—आत्मा के समीप निवास करना, अर्थात् अपने भीतर झाँककर आत्मशुद्धि, आत्मचिंतन और आत्मोन्नति का मार्ग अपनाना। यह पर्व मनुष्य को बाह्य आकर्षणों से हटाकर आत्मकल्याण की ओर अग्रसर होने की प्रेरणा देता है।
श्वेतांबर एवं दिगंबर दोनों परंपराओं में यह पर्व अलग-अलग स्वरूप में मनाया जाता है।
श्वेतांबर परंपरा में यह आठ दिनों तक मनाया जाता है, जिसका अंतिम दिन संवत्सरी कहलाता है। इस दिन सभी प्राणियों से क्षमायाचना कर पर्व का समापन किया जाता है।
दिगंबर परंपरा में इसे दस दिनों तक दशलक्षण महापर्व के रूप में मनाया जाता है, जिसका अंतिम दिन उत्तम क्षमा को समर्पित होता है।
पर्युषण के दिनों में साधु-साध्वियाँ एक स्थान पर विराजमान होकर धर्मोपदेश, प्रवचन एवं आगमों का वाचन करते हैं। श्रद्धालु इन प्रवचनों को श्रद्धापूर्वक सुनते हैं तथा धर्म के सिद्धांतों को अपने जीवन में उतारने का संकल्प लेते हैं।

इस पर्व का सबसे महत्त्वपूर्ण संदेश अहिंसा, करुणा, मैत्री और क्षमा है। जैन दर्शन के अनुसार मनुष्य को केवल शारीरिक हिंसा ही नहीं, बल्कि वाणी और विचारों से होने वाली हिंसा से भी बचना चाहिए। मन में किसी के प्रति वैर, द्वेष अथवा कटुता का भाव नहीं रखना चाहिए। यदि किसी से जाने-अनजाने कोई भूल हो जाए तो विनम्रतापूर्वक उससे क्षमा माँगना ही सच्चे वीर का लक्षण है।
आज के समय में अधिकांश मानसिक तनाव, पारिवारिक विघटन और सामाजिक संघर्ष का मूल कारण मन में संचित द्वेष एवं अहंकार है। पर्युषण हमें इन नकारात्मक भावों से मुक्त होकर प्रेम, सौहार्द और सद्भाव का मार्ग अपनाने की प्रेरणा देता है।
इस अवधि में श्रद्धालु अपनी सामर्थ्य के अनुसार उपवास, एकासन, आयंबिल, स्वाध्याय, ध्यान, पूजा, आराधना एवं प्रतिक्रमण जैसे धार्मिक अनुष्ठान करते हैं। श्वेतांबर परंपरा में कल्पसूत्र का वाचन तथा तीर्थंकरों एवं महान आचार्यों के जीवन-चरित्र का अध्ययन किया जाता है। प्रतिदिन प्रातः और रात्रि में प्रतिक्रमण के माध्यम से आत्मनिरीक्षण एवं आत्मशुद्धि का अभ्यास किया जाता है।
संवत्सरी के दिन सामूहिक क्षमायाचना का विशेष महत्त्व है। इस अवसर पर प्रत्येक व्यक्ति अपने परिवार, मित्रों, परिचितों तथा समस्त जीवों से वर्ष भर में जाने-अनजाने हुई त्रुटियों के लिए हृदय से क्षमा माँगता है और “मिच्छामि दुक्कडम्” कहकर मैत्री, सद्भाव और क्षमा का संदेश देता है।
पर्युषण महापर्व हमें यह शिक्षा देता है कि जीवन का वास्तविक उद्देश्य केवल भौतिक सुख-सुविधाएँ प्राप्त करना नहीं, बल्कि आत्मिक उन्नति, संयम, सेवा, सदाचार और समस्त प्राणियों के कल्याण की भावना का विकास करना है। यदि हम इस पर्व के आदर्शों को अपने जीवन में अपनाएँ, तो व्यक्तिगत, पारिवारिक और सामाजिक जीवन अधिक सुखी, शांतिपूर्ण एवं समरस बन सकता है।
मिच्छामि दुक्कडम्।

