प्राण-प्रतिष्ठा महोत्सव में बहा बेकसूर का रक्त:भगवान भी नहीं बचा पाए इस महिला के प्राण: महिलाओं की पंक्ति में सबसे आगे हिमाचल का प्रमुख नाटी नृत्य कर रही थी जिसकी हवाई फायरिंग में चली गई जान
हिमाचल- मंदिर प्राण-प्रतिष्ठा महोत्सव हवाई फायरिंग में गई निर्दोष महिला की जान

एस आर हरनोट वरिष्ठ कवि लेखक और साहित्यकार की कलम से दर्दनाक मौत पर तीखी टिप्पणी
देव महाराज आपमें प्राण डालते डालते चले गए एक बिटिया के प्राण…
…..अंध भक्ति और अंधविश्वास की कोई सीमा नहीं होती। सरकार लाख दावा करे कि हिमाचल शत प्रतिशत साक्षर हो गया है परंतु जब एक देव उत्सव में देवता की प्राण प्रतिष्ठा करते अंधभक्तों कि बंदूक की गोली नाचती गाती एक बेटी की जान ले तो विश्वास कर लेना चाहिए कि हिमाचल का देव समाज कितना अनपढ़ है…? अंधविश्वासी है….?
आज के समय में पहले की तरह देव समितियों में अनपढ़ लोग नहीं है, उन में सेवानिवृत्त अधिकारी और खासे पढ़े लिखे “उच्च” समाज के वे लोग हैं जो गले में मनुवादी पट्टे बांध कर कभी देवालयों के प्रांगण में, कभी चौराहों पर तो कभी खेत खलिहानों में अपने को सबसे श्रेष्ठ सिद्ध करने में लगे रहते हैं।

दलितों को, उनके आरक्षण को गरियाते रहते हैं…? होना तो यह चाहिए था कि इन लोगों को एक लड़ाई इन अंध पाखंडों के विरुद्ध भी लड़नी चाहिए थी जहां देवता के नाम पर घोर जातिगत वैमनस्य भरा पड़ा है, व्यर्थ की दबंग प्रथाएं मान्य होती जा रही है और नशे में धुत्त चंद लोगों के लिए न देवता के कोई मायने हैं न वे किसी की जान की कीमत जानते हैं।
आप पिछले कई सालों की सुर्खियां देख लें तो पता चलेगा कि देव संस्कृति की आड़ में क्या कुछ नहीं घट रहा है जहां न कोई संवेदना बची है, न संस्कृति और न ही डर। इसका ताजा उदाहरण रोहड़ू के कुलगांव में हवाई फायरिंग के दौरान एक बेटी की हत्या हो जाना है जो देव आस्था में, उसकी प्रतिष्ठा में, मूर्ति में प्राण डालने के उत्सव में अपने ही प्राण गवां बैठी है।
यह घटना साधारण नहीं है। सीधे सीधी देव संस्कृति पर प्रश्नचिन्ह भी है कि क्या धार्मिक अनुष्ठानों में देवता बंदूकों से खुश प्रसन्न किए जाएंगे….? जिन दो लोगों को हत्या के आरोपों में पकड़ा गया है वे निःसंदेह अनपढ़ गंवार नहीं होंगे, सम्पन्न परिवारों से होंगे और देवता कमेटी के भी खास और विशेष रहे होंगे कि बिना किसी भय के बंदूकें उठा कर यह भी नहीं देख पाए कि आखिर बंदूक का मुंह किस तरफ है। यह तभी होता है जब आप अंधविश्वासों में पागल हो या मानसिक रूप से विक्षिप्त या फिर संपन्नता का इतना नशा हो जाए कि इंसान भी “बकरे बकरियां” दिखने लग जाए।

देव प्रांगण में ये हत्या देवता और देव समिति पर एक कलंक है और दोषी केवल दो लोग नहीं पूरी देव कमेटी भी तो है जिनकी स्वीकृति से यह सब “उल्लास का खेल” होता रहा। केवल दो ही लोग नहीं होंगे….?

वायरल वीडियो और रिपोर्टों में तो उल्लास फायरिंग में कई लोग शामिल बताए गए हैं। आप कहेंगे, एक मंदिर की घटना है और प्रश्नचिन्ह सभी पर….? परंतु इतिहास बहुत क्रूर है।
देवता विनम्रता और दया का प्रतीक है, वैमनस्य का नहीं। उससे जुड़े लोग समाज को भाईचारे में बांधे रहने में सक्षम है परंतु इक्कीसवीं सदी में भी जब इंसानों के छूने भर से वह अपवित्र हो जाए तो आप उसे “देवता” कैसे स्वीकार पाएंगे….?
एक बेटी चली गई, एक पत्नी, एक मां जिसके मन में उस देवता के प्रति न जाने कितनी आस्था रही होगी……अपनी भक्ति का इजहार करते करते अपनी ही हत्या हो गई….? देवता में प्राण डालते अपने प्राण चले गए….? देवता की कोई शक्ति नहीं आई बचाने….? न देवता का गुरु न पुजारी….? सोच कर रूह कांप जाती है कि कैसे एक निर्दोष के प्राण चले गए…..ले लिए गए….? अब दबंगता, बचाव का खेल भी शुरू होगा ही…..पहले भी आप ऐसे तमाशे देख चुके हैं।

पर अभी न्याय व्यवस्था पर विश्वास तो है ही।क्या देव कमेटी भी दोषी नहीं….? क्या वह मंदिर अब प्रतिबंधित नहीं होना चाहिए जिसके प्रांगण में हत्या हुई है….? क्या देव कमेटी को इसका हर्जाना नहीं देना चाहिए….? उन्हें इसके पश्चाताप में उस बेटी के मासूम बच्चों की शिक्षा और परिवार का आजीवन खर्च नहीं उठाना चाहिए….?

जब देव कमेटियां देवता को इंसानों के छूने पर उन्हें गांव निष्कासन तक की सजा दे देता है तो इन हत्यारों को भी ऐसी सजा देव कमेटी को नहीं देनी चाहिए….?ये उदगार आंसुओं से लिखे गए हैं। उस बेटी के परिवार पर तो पहाड़ टूटा है परंतु हम भी कम आहत नहीं है। इस घटना को स्मरण करते ही कलेजा मुंह को आने लगता है। मैं आज सुबह से परेशान हूं। आँखें भरी हुई हैं। मन बेहद उदास है। उस बेटी का चेहरा बार बार फेस बुक की पोस्टों से निकल कर आंखों में, मन में चीखने लगता है।
कबीर का दोहा याद आ रहा है..
……पाहन पूजे हरि मिलें, तो मैं पूजूँ पहार।ताते ये चाकी भली, पीस खाय संसार |
|देवता! पता नहीं आपकी मूर्ति में प्राण आए कि नहीं, परंतु आपके सामने, आपके प्रांगण में एक बेटी ने प्राण खो दिए… हत्या हो गई उसकी……तू शक्ति का देवता है……उसे बचा लेता……?

क्षमा याचना सहित(यह घटना देवता की प्राण प्रतिष्ठा के उत्सव में उस वक्त हुई जब यह बेटी महिलाओं की लंबी कतार में सबसे आगे झूम झूम कर नाटी नृत्य कर रही थी। विडंबना देखिए, गोली ने भी इसे ही चुना। बताया जा रहा है देवता का नया मंदिर पांच करोड़ की लागत से कई सालों के निर्माण के बाद बना है।)